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Page/अंग/पेज Verse # / पंक्ति # Gurbani in Gurmukhi / गुरबाणी गुरमुखी Gurbani in Hindi / गुरबाणी हिंदी Translation Hindi / व्याख्या हिंदी Baani Name or Raag / बाणी या राग Author / उच्चारक
1 1 ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ ੴ- इस शब्द का शुद्ध उच्चारण है - 'एक ओंकार'। इसके उच्चारण में इसके तीन अंश किए जाते हैं। इन तीनों के भावार्थ भी अलग-अलग ही हैं। १ - एक (अद्वितीय)। ऑ- वही। ओंकार (~) निरंकार ; अर्थात्-ब्रह्म, करतार, ईश्वर, परमात्मा, भगवान, वाहिगुरु । १ ऑ- निरंकार वही एक है। सति नामु - उसका नाम सत्य है। करता - वह सृष्टि व उसके जीवों की रचना करने वाला है। पुरखु - वह यह सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिवान) है। निरभउ - उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं। अर्थात् - अन्य देव-दैत्यों तथा सांसारिक जीवों की भाँति उसमें द्वेष अथवा जन्म-मरण का भय नहीं है ; वह इन सबसे परे हैं। निरवैरु- वह बैर (द्वेष/दुश्मनी) से रहित है। अकाल- वह काल (मृत्यु) से परे है; अर्थात्-वह अविनाशी है। मूरति - वह अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव रहता है। अजूनी - वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्कर से रहित है। सैभं - वह स्वयं से प्रकाशमान हुआ है। गुर - अंधकार (अज्ञान) में प्रकाश (ज्ञान) करने वाला (गुरु)। प्रसादि- कृपा की बख्शिश। अर्थात्-गुरु की कृपा से यह सब उपलब्ध हो सकता है। Moolmantar Guru Nanak Dev
1 2 ॥ ਜਪੁ ॥ ॥ जपु ॥ जाप करो। (इसे गुरु की वाणी का शीर्षक भी माना गया है।) Jap Guru Nanak Dev
1 3 ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥ आदि सचु जुगादि सचु ॥ निरंकार (अकाल पुरुष) सृष्टि की रचना से पहले सत्य था, युगों के प्रारम्भ में भी सत्य (स्वरूप) था। Jap Guru Nanak Dev
1 4 ਹੈ ਭੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭੀ ਸਚੁ ॥੧॥ है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥१॥ अब वर्तमान में भी उसी का अस्तित्व है, श्री गुरु नानक देव जी का कथन है भविष्य में भी उसी सत्यस्वरूप निरंकार का अस्तित्व होगा II १ II Jap Guru Nanak Dev
1 5 ਸੋਚੈ ਸੋਚਿ ਨ ਹੋਵਈ ਜੇ ਸੋਚੀ ਲਖ ਵਾਰ ॥ सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार ॥ यदि कोई लाख बार शौच (स्नानादि) करता रहे तो भी इस शरीर के बाहरी स्नान से मन की पवित्रता नहीं हो सकती। मन की पवित्रता के बिना परमेश्वर (वाहिगुरु) के प्रति विचार भी नहीं किया जा सकता। Jap Guru Nanak Dev
1 6 ਚੁਪੈ ਚੁਪ ਨ ਹੋਵਈ ਜੇ ਲਾਇ ਰਹਾ ਲਿਵ ਤਾਰ ॥ चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार ॥ यदि कोई एकाग्रचित्त समाधि लगाकर मुँह से चुप्पी धारण कर ले तो भी मन की शांति (चुप) प्राप्त नहीं हो सकती; जब तक कि मन से झूठे विकार नहीं निकल जाते। Jap Guru Nanak Dev
1 7 ਭੁਖਿਆ ਭੁਖ ਨ ਉਤਰੀ ਜੇ ਬੰਨਾ ਪੁਰੀਆ ਭਾਰ ॥ भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार ॥ बेशक कोई जगत् की समस्त पुरियों के पदार्थों को ग्रहण कर ले तो भी पेट से भूखे रह कर (व्रत आदि करके) इस मन की तृष्णा रूपी भूख को नहीं मिटा सकता। Jap Guru Nanak Dev
1 8 ਸਹਸ ਸਿਆਣਪਾ ਲਖ ਹੋਹਿ ਤ ਇਕ ਨ ਚਲੈ ਨਾਲਿ ॥ सहस सिआणपा लख होहि त इक न चलै नालि ॥ चाहे किसी के पास हज़ारों-लाखों चतुराई भरे विचार हों लेकिन ये सब अहंयुक्त होने के कारण परमेश्वर तक पहुँचने में कभी सहायक नहीं होते। Jap Guru Nanak Dev
1 9 ਕਿਵ ਸਚਿਆਰਾ ਹੋਈਐ ਕਿਵ ਕੂੜੈ ਤੁਟੈ ਪਾਲਿ ॥ किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ॥ अब प्रश्न पैदा होता है कि फिर परमात्मा के समक्ष सत्य का प्रकाश पुंज कैसे बना जा सकता है, हमारे और निरंकार के बीच मिथ्या की जो दीवार है वह कैसे टूट सकती है ? Jap Guru Nanak Dev
1 10 ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ ॥੧॥ हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ॥१॥ सत्य रूप होने का मार्ग बताते हुए श्री गुरु नानक देव जी कथन करते हैं - यह सृष्टि के प्रारंभ से ही लिखा चला आ रहा है कि ईश्वर के आदेश अधीन चलने से ही सांसारिक प्राणी यह सब कर सकता है II १ II Jap Guru Nanak Dev
1 11 ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਆਕਾਰ ਹੁਕਮੁ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ ॥ हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई ॥ (सृष्टि की रचना में) समस्त शरीर (निरंकार के) आदेश द्वारा ही रचे गए हैं, किन्तु उसके आदेश को मुँह से शब्द निकाल कर ब्यान नहीं किया जा सकता। Jap Guru Nanak Dev
1 12 ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਜੀਅ ਹੁਕਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ॥ हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई ॥ परमेश्वर के आदेश से (इस धरा पर) अनेकानेक योनियों में जीवों का सृजन होता है, उसी के आदेश से ही मान-सम्मान (अथवा ऊँच - नीच का पद) प्राप्त होता है। Jap Guru Nanak Dev
1 13 ਹੁਕਮੀ ਉਤਮੁ ਨੀਚੁ ਹੁਕਮਿ ਲਿਖਿ ਦੁਖ ਸੁਖ ਪਾਈਅਹਿ ॥ हुकमी उतमु नीचु हुकमि लिखि दुख सुख पाईअहि ॥ परमेश्वर (वाहिगुरु) के आदेश से ही जीव श्रेष्ठ अथवा निम्न जीवन प्राप्त करता है, उसके द्वारा ही लिखे गए आदेश से जीव सुख और दुख की अनुभूति करता है। Jap Guru Nanak Dev
1 14 ਇਕਨਾ ਹੁਕਮੀ ਬਖਸੀਸ ਇਕਿ ਹੁਕਮੀ ਸਦਾ ਭਵਾਈਅਹਿ ॥ इकना हुकमी बखसीस इकि हुकमी सदा भवाईअहि ॥ परमात्मा के आदेश से ही कई जीवों को कृपा मिलती है, कई उसके आदेश से आवागमन के चक्र में फँसे रहते हैं। Jap Guru Nanak Dev
1 15 ਹੁਕਮੈ ਅੰਦਰਿ ਸਭੁ ਕੋ ਬਾਹਰਿ ਹੁਕਮ ਨ ਕੋਇ ॥ हुकमै अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ ॥ उस सर्वोच्च शक्ति परमेश्वर के अधीन ही सब-कुछ रहता है, उससे बाहर संसार का कोई कार्य नहीं है। Jap Guru Nanak Dev
1 16 ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੈ ਜੇ ਬੁਝੈ ਤ ਹਉਮੈ ਕਹੈ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥ नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ ॥२॥ हे नानक ! यदि जीव उस अकाल पुरुष के आदेश को प्रसन्नचित्त होकर जान ले तो कोई भी आहंकारमयी 'मैं' के वश में नहीं रहेगा। यही अहंतत्व सांसारिक वैभव में लिप्त प्राणी को निरंकार के निकट नहीं होने देता॥ २ II Jap Guru Nanak Dev
1 17 ਗਾਵੈ ਕੋ ਤਾਣੁ ਹੋਵੈ ਕਿਸੈ ਤਾਣੁ ॥ गावै को ताणु होवै किसै ताणु ॥ (परमेश्वर की कृपा से ही) जिस किसी के पास आत्मिक शक्ति है, वही उस (सर्वशक्तिमान) की ताकत का यश गायन कर सकता है। Jap Guru Nanak Dev
1 18 ਗਾਵੈ ਕੋ ਦਾਤਿ ਜਾਣੈ ਨੀਸਾਣੁ ॥ गावै को दाति जाणै नीसाणु ॥ कोई उसके द्वारा प्रदत बख्शिशों को (उसकी) कृपादृष्टि मानकर ही उसकी कीर्ति का गुणगान कर रहा है। Jap Guru Nanak Dev
1 19 ਗਾਵੈ ਕੋ ਗੁਣ ਵਡਿਆਈਆ ਚਾਰ ॥ गावै को गुण वडिआईआ चार ॥ कोई जीव उसके अकथनीय गुणों व महिमा को गा रहा है। Jap Guru Nanak Dev
1 20 ਗਾਵੈ ਕੋ ਵਿਦਿਆ ਵਿਖਮੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥ गावै को विदिआ विखमु वीचारु ॥ कोई उसके विषम विचारों (ज्ञान) का गान विद्या द्वारा कर रहा है। Jap Guru Nanak Dev
1 21 ਗਾਵੈ ਕੋ ਸਾਜਿ ਕਰੇ ਤਨੁ ਖੇਹ ॥ गावै को साजि करे तनु खेह ॥ कोई उसका गुणगान रचयिता व संहारक ईश्वर का रूप जानकर करता है। Jap Guru Nanak Dev
1 22 ਗਾਵੈ ਕੋ ਜੀਅ ਲੈ ਫਿਰਿ ਦੇਹ ॥ गावै को जीअ लै फिरि देह ॥ कोई उसका बखान इस प्रकार करता है कि वह परम सत्ता जीवन देकर फिर वापिस ले लेती है। Jap Guru Nanak Dev
1 23 ਗਾਵੈ ਕੋ ਜਾਪੈ ਦਿਸੈ ਦੂਰਿ ॥ गावै को जापै दिसै दूरि ॥ कोई जीव उस निरंकार को स्वयं से दूर जानकर उसका यश गाता है। Jap Guru Nanak Dev
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